मां को है डायबिटीज तो शुगर कंट्रोल होने पर भी शिशु को हो सकता है मधुमेह का खतरा

मां को है डायबिटीज तो शुगर कंट्रोल होने पर भी शिशु को हो सकता है मधुमेह का खतरा

Diabetes Risk For Fetus : मॉर्डन लाइफस्टाइल के कारण डायबिटीज (Diabetes) के बढ़ते रिस्क और उसके साइड इफैक्ट्स चिंता के कारण बने हुए हैं. दैनिक जागरण में छपी खबर के अनुसार, अब एक नई स्टडी में पाया गया है कि यदि माताएं डायबिटिक हों और इंसुलिन को नियंत्रित रखकर ब्लड शुगर का लेवल ठीक भी रखा जाए, तब भी भ्रूण (Fetus) को स्थायी तौर पर नुकसान हो सकता है. स्टडी का यह निष्कर्ष ‘साइंस एडवांसेज’ जर्नल में छपा है.

बता दें कि दुनियाभर में डायबिटीज से पीड़ित करीब 6 करोड़ महिलाएं सालाना मां बनती हैं. इनमें से 3 से 4 लाख भ्रूणों में माताओं के डायबिटिक होने के कारण न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट (Neural tube defect) की विकृति होती है. इससे भ्रूण का मस्तिष्क और रीढ़ सही तरीके से विकसित नहीं हो पाते. इस कारण अबॉर्शन (Abortion) या बच्चों में गंभीर दिव्यांगता (severe disability) का भी जोखिम बढ़ जाता है.

यह भी पढ़ें- खाने के बाद पेट में जलन और दर्द से रहते हैं परेशान, तो इन 3 घरेलू उपायों की लें मदद

यूनिवर्सिटी आफ मेरीलैंड स्कूल आफ मेडिसिन (UMSOM) के शोधकर्ताओं ने जन्मजात होने वाली इन विकृतियों के कारणों का पता लगाने के लिए माउस माडल पर अध्ययन किया है. जिसके मुताबिक, समय से पहले ही न्यूरल टिश्यू की एजिंग (बुढ़ापा) हो जाती है, इसके कारण न्यूरल ट्यूब के निर्माण के लिए पर्याप्त कोशिकाओं का बनना रूक जाता है.

स्टडी को लीड करने वाले यूएमएसओएम सेंटर फार बर्थ डिफेक्ट्स रिसर्च के प्रोफेसर पेक्सिन यांग ने बताया, “वैसे तो डायबिटीज आमतौर पर बुजुर्गो की बीमारी मानी जाती रही है. लेकिन इस समय यह बीमारी युवाओं में मोटापा और शरीर से मेहनत नहीं करने कारण महामारी की तरह फैल रही है. इससे बढ़ती उम्र से जुड़ी कई और बीमारियां भी होती हैं. अब हमें यह भी पता चला है कि हाई ब्लड ग्लूकोज भ्रूणों में भी प्रीमैच्योर एजिंग (समय से पहले ही बुढ़ापा) को उत्प्रेरित (inspired) करता है या बढ़ा देता है.”

यह भी पढ़ें- कोरोना खत्म होने को लेकर अगर मन में हैं सवाल, जानें क्या कहते हैं वैज्ञानिक

प्रोफेसर पेक्सिन यांग ने आगे कहा, वैसे तो यह बात दशकों से कही जाती रही है कि माताओं के डायबिटक होने से भ्रूणों में प्रीमैच्योर एजिंग होती है, जिससे बच्चे जन्मजात विकृतियों से ग्रसित होते हैं. लेकिन इस बात को पुख्ता तौर पर परखने के लिए हमें हाल-फिलहाल में टूल और टेक्नोलाजी मिली है.

जानकारी होने से रोकी जा सकती हैं प्रॉब्लम
माताओं के डायबिटिक होने से भ्रूण में पैदा होने वाली विकृतियों की पूरी प्रक्रिया की जानकारी होने का फायदा यह होगा कि उनकी रोकथाम के उपाय ढूंढे जाने का रास्ता साफ हो सकेगा. स्टडी के दौरान रिसर्चर्स ने कैंसर की एक दवा के इस्तेमाल से टिश्यू में एजिंग की प्रक्रिया को धीमा करने में सफलता पाई है, जिससे डायबिटिक चूहियों के भ्रूण में न्यूरल ट्यूब का पूर्ण विकास हुआ. इस निष्कर्ष के आधार पर सटीक थेरेपी विकसित कर अबॉर्शन या बच्चों में कई प्रकार की जन्मजात विकृतियों की रोकथाम की जा सकती है.

भ्रूण में डिफेक्ट होने का ऐसे लगाया पता
रिसरर्चर्स ने पहले पाया कि डायबिटीज से पीड़ित चूहिया के आठ दिनों के बच्चों में प्रीमैच्योर एजिंग के मार्कर पाए गए. जबकि जिन्हें डायबिटीज नहीं थी, उनके बच्चों में ये मार्कर नहीं पाए गए. यह भी पाया गया कि जिन कोशिकाओं में प्रीमैच्योर एजिंग मार्कर थे, उनसे बड़ी मात्रा में रसायनों का स्त्राव होता है, जो पास की कोशिकाओं को नष्ट कर देते हैं.

शोध के अगले चरण में डायबिटिक मां से जन्मे बच्चों को कैंसर की एक दवा रैपामाइसिन दी गई. यह दवा प्रीमैच्योर एजिंग वाले सेल्स से विषाक्त केमिकल के स्त्राव या सिग्नल को रोकने के काम आती है. इसके बाद पाया गया कि रैपामाइसिन दिए जाने पर न्यूरल ट्यूब पूर्ण रूप से विकसित हुई. यह स्वस्थ मां से जन्मे बच्चों की तरह ही थी.

इससे यह सामने आया कि इस दवा से एजिंग वाली कोशिकाएं सामान्य व्यवहार करने लग जाती हैं. लेकिन दुर्भाग्यवश, रैपामाइसिन से बहुत सारी अन्य कोशिकाएं भी प्रभावित हुईं. इसलिए यह दवा न्यूरल ट्यूब की विकृतियों की रोकथाम के उपयुक्त नहीं हो सकती हैं. इलाज का कोई और विकल्प खोजना होगा.

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

Source link

Add comment

Your Header Sidebar area is currently empty. Hurry up and add some widgets.