महामारी की खबरों के लगातार संपर्क में रहना भी बढ़ा सकता है तनाव, डिप्रेशन

महामारी की खबरों के लगातार संपर्क में रहना भी बढ़ा सकता है तनाव, डिप्रेशन

World suicide prevention day : हर साल 10 सितंबर को आत्महत्याओं की प्रवृति को रोकने के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस ( World Suicide Prevention Day) मनाया जाता है.  कोरोना महामारी के दौर में नौकरियां छिन जाने, अपने करीबियों को खोने और अकेलेपन ने लोगों को चिंतित, उदास और अतिसंवेदनशील बना दिया है. जिसके चलते भी कई लोग इस गलत रास्ते यानी आत्महत्या की तरफ मुंह करके खड़े हैं. महामारी की शुरुआत पर लौटें, तो बार-बार किए गए लॉकडाउन, चलने-फिरने की आज़ादी का नुकसान, लोगों से न मिल पाना या मेलजोल न कर पाना, इतने लोगों को पीड़ित और मरते देखना, ऐसा लगता है कि हम एक युद्ध से गुज़रे हैं और इसके साथ हम एक युद्धक्षेत्र में मौजूद होने के परिणाम भुगत रहे हैं.

इसका असर हमारे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है और अभी तक कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता है कि यह  नुकसान कितना हुआ है. हम जो जानते हैं वो ये है कि कोविड -19 ने एंजायटी (चिंता), डिप्रेशन, अभिघातजन्य तनाव विकार (post-traumatic stress disorder) और मनोवैज्ञानिक और मानसिक संकट की सुनामी पैदा की है.

द् मिरर की रिपोर्ट में कील विश्वविद्यालय (Keele University) के शोधकर्ता फ़राज़ मुगल के अनुसार, कर्मचारी और सहकर्मी, छोटे बच्चों के साथ रहना, पहले से मौजूद पुरानी या मानसिक बीमारी, युवा होना, महिला होना, और महामारी की खबरों के लगातार संपर्क में रहना, ये सभी संकट से जुड़े रिस्क फैक्टर्स हैं. और पहले से मौजूद मानसिक बीमारी वाले लोगों के लिए, कोविड -19 के निहितार्थ गंभीर हैं.

40% मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित 
लगभग 90% मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का प्रबंधन पूरी तरह से समुदाय (प्राथमिक देखभाल) में किया जाता है, और जीपी (जनरल प्रैक्टिश्नर) का कहना है कि उनके कार्यभार का लगभग 40% मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित है. माना जाता है कि कोविड-19 ने अब तक लगभग 10 मिलियन लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया या प्रभावित कर सकता है.

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कोविड ने कैसे बढ़ाई टेंशन
लंबे समय तक कोविड के मरीज लगातार लक्षणों के कारण होने वाले भय, अनिश्चितता और निराशा के बारे में बात करते हैं और मेंटल हेल्थ सपोर्ट पर जोर देते हैं, जो उनके ठीक होने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. जो लोग कोविड की चपेट में आए, वो अपने स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं, जबकि जो लोग आईसीयू में भर्ती हुए, और उनके परिवार और देखभाल करने वाले भी वैसे ही मानसिक संकट का अनुभव कर सकते हैं.

ऑनलाइन कंसल्टेशन बेअसर?
डॉक्टर और मरीज के बीच आमने-सामने बातचीत नहीं होने के नुकसान के साथ, मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों के लिए ऑनलाइन कंसल्टेशन बढ़ोतरी हुई है, जिसने भी एक इफेक्टिव मेंटल हेल्थ केयर के लिए जरूरी क्लोज रिलेशन को कम करने का काम किया है.

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इसके अलावा, दूर से ही डॉक्टर से सलाह लेने से एक कमी ये हो सकती है कि एक डॉक्टर शायद जरूरी सुराग नहीं ले सकते, जिसमें घरेलू हिंसा, खुद को नुकसान पहुंचाने, दुख, लो मूड, मनोविकृति (psychosis) के लक्षण, या चिंता (anxiety) शामिल है, विशेष रूप से युवा लोगों, माता-पिता और देखभाल करने वालों में. डॉक्टरों के पास आत्म-देखभाल वाले रोगियों (patients with self-care) के लिए आवश्यक समय और संसाधन होने चाहिए

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